वक़्त के जोड़ घटाने में भावों की गिनती खो सी गई
पचपन ने कहा बचपन से है मुझमें भी बाकी कुछ बचपना,
दुबका बैठा है किसी गहरे कोने में जिम्मेदारियों ने जबसे मुझको है चुना
कभी थकान, कभी परेशान
पर लिए मुख पर मुस्कान
थोड़ी यादों की दस्तक
और आनेवाले कल की लिये उड़ान
अनुभव का आश्रय लिए चेतना
अब भी इस पचपन में हैं संजोए है
थोड़ा से बचपन की पहचान
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